रासलीला : युवाओं के लिए

 



रासलीला : युवाओं के लिए 


इस लेख को पढ़ने वाले सभी शायद ये तो मानते ही हैं  की श्रीकृष्ण भगवान हैं। हो सकता है कि कुछ कुछ लोग सोचते हों कि श्रीकृष्ण ने भगवान  होकर भी सामान्य मानव की तरह  माखन चोरी और रास जैसी लीलाएं क्यों की? विशेष रूप से रास के बारे में जो सामान्य अवधारणा है वह निश्चित ही चिंताजनक है। हमें ये समझना चाहिए कि रास स्त्री पुरुष की एक सामान्य मानवीय क्रीड़ा नहीं है। रास के बारे में कुछ बिंदुओं पर विचार करना चाहिए 


१. श्री कृष्ण परात्पर परब्रह्म हैं इसलिए उनकी लीलाओं में मानवीय गुण दोषों की कल्पना भी नहीं करनी चाहिए।  


२. भगवान श्रीकृष्ण ने ११ वर्ष और ५६ दिन की आयु में ब्रज भूमि से मथुरा गमन किया था।  श्रीमद्भागवत महापुराण और श्री गर्गसंहिता जी आदि ग्रंथो से सन्दर्भ लें तो रास उनके ब्रज लीला में  था और रास के समय श्री कृष्ण की आयु मात्र १० वर्ष थी।  १० वर्ष के बालक में स्त्री-कामना या सहवास का दोष घटना संभव नहीं है। आज के युवाओं को यह समझना चाहिए की ९-१० वर्ष के बालक और गोपियों में प्रेम का कौन सा स्तर होगा। 


३. अगर भगवान ने रास लीला के नाम पर व्यभिचार किया होता तो उनके समकालीन आलोचकों (जैसे शिशुपाल आदि ) ने अन्य गालियों के साथ प्रभु को व्यभिचारी होने की गाली भी दी होती।  अपने ग्रंथो में देखें तो पता चलेगा की शिशुपाल दुर्योधन आदि ने भगवान को असभ्य ग्वाला तो कहा लेकिन व्यभिचारी कभी भी नहीं कहा। जब उनके समकालीन कट्टर शत्रुओं ने रास में व्यभिचार का  दर्शन नहीं किया तो हम उनके प्रेमी होकर ऐसा क्यों सोचते हैं?


४. रास भगवान की कामदेव के ऊपर विजय का प्रतीक है।  जब कामदेव पर विजय प्राप्त हो गयी तो संसारिक दोष कहाँ रहा?


ऐसे अनेक तथ्य हैं जिनसे यह सिद्ध होता है श्रीकृष्ण की रासलीला काम की सामन्य क्रीड़ा न  होकर आत्मा और जीव का चिरंतन एकरूप होना है। वर्तमान युवाओं को ये समझना होगा की रास एक साधारण पाशविक लीला नहीं है , यह तो दैविक, भौतिक और आध्यात्मिक कल्पनाओं के समाप्त होने पर होने वाली स्वाभाविक, भगवदीय और सहज घटना है। 


जय श्री कृष्ण।  कृष्णमातिरस्तु। 

Comments

Popular posts from this blog

श्री जगन्नाथ भगवान के प्रचलित रहस्य और प्रभु श्रीकृष्ण के लीला प्रयाण के सन्दर्भ में